सशरीर ओर अजीवित सःआत्मा भारतीय प्रजातंत्र का प्रतिनिधित्व करने वाली जीबों (जीबों मतलब जिह्वा बुद्धिमान हूँ इसलिए समझा रहा हूँ,ज्ञान लेलो ओर स्वयं को सराहो बाद में मत कहना "बाद"कब आयेगा?हमें नहीं पता बस) अध्ययन करने में जुटे हुये हैं । इन जुबानों का मस्तिष्क के सांथ कोई संबंध नही है ये जानकर उन्हें रत्ती भर भी आश्चर्य नही हुआ।प्रायोगिक अध्यन से यह बात पहले ही प्रमाणित हो चुकी थी। अब ये सबाल उठ रहा था कि (पता नही ये सबाल उठता क्यों है बैठा क्यों नही रहता या सोया क्यों नहीं रहता,हमे नहीं पता बस)इन अनियंत्रित जुबानों का नियंत्रण कौन कर रहा है ?मूर्ख मत समझो अनियंत्रित कहने का तात्पर्य बेलगाम है बिलावजह खुश होने लगे कि हर कुछ लिख दिया।इधर प्रयोग चल रहे हैं उधर ज़बानें चल रहीं हैं,बाजारू वार्तालाप प्रजातंत्र को इतना शर्मिंदा कर चुका है कि वो भी बेशरम हो चुका है सांसारिक राग द्वेष से परे।
नेता मनचले होकर "A" प्रमाण पत्र की फ़िल्म बन गये हैं।सेन्सर बोर्ड प्रसारण मीडिया बेचैन होने की बजाय बिना कांट छांट के उनके हर डायलाग का रपीटिंग पे रिपीटिंग टेलीकास्ट कर रहा है-फिर ज़बान फिसली वे ये बोले ये बोले ये बोले बस यार अब रुक भी जाओ,शर्मिंदगी का घड़ा भर गया है झलकाओगे क्या?बुद्धी जीवी प्रकार के जनों ने अपनी अपनी बुद्धियाँ लाकरों रख कर ताले लगा दिये। अनर्गल प्रलाप कानों तक जाके ही रुक जाता है,क्यों समस्या लें? वैसे भी भारतीय राजनीति उथलेपन की बेमिशाल मिशाल है,अर्थात उथले पन से गुजर रही है देखना संभल के कहीं गुजर ही ना जाये गयी गुजरी।
हम तो नेतृत्व की घण्टी गले में डाल घनघनाने बाले मानवों की बिगड़ेल जबानों का शरीर के दूसरे हिस्सों से सम्बन्ध की विवेचना कर रहे थे,भटके नहीं हैं प्रयोग तो चल ही रहा है पर पता नही प्रयोग करने बाले ज्ञानी विज्ञानी लोगों की ज़बानें लकबे की शिकार हो गयीं । निष्कर्ष ही एँसे प्राप्त हो रहे थे।जबानों का शरीर के किसी भी अंग के सांथ संबंध स्थापित ही नहीं हो रहा था , बेचारे हताश ओर निराश प्रयोगकर्ता अवसाद के शिकार हो के रह गये।हताशा में प्रयोग बंद करके जीवित पान खाने पान की दूकान पर पहुंचे अजीवित आत्माएं दुवारा नही आने का संकल्प करके अपने अपने लोक को प्रस्थान कर गयीं। पान बाला (लगभग सभी पान बाले) जितनी तेज पान में चूना ओर कत्था लगाता था उससे कहीं तेज उसकी जबान चलती थी।देश विदेश की हर घटना ओर दुर्घटना का सूचना केंद्र (भारत मे)चाय पान की दूकानें ओर केश कर्तनालय होते हैं।पत्रकारिता में डिग्री देने बाले संस्थान इन सूचना केंद्रों को जल्दी ही अपनी प्रयोगशाला घोषित करके शिक्षार्थियों की अधिकतर कक्षाएँ यहीं लगाने की योजना बना रहे हैं।
तो साहब जब प्रयोगधर्मी जन पान की दूकान पर पहुंचे तो अनुभवी पान वाला इनकी बेचैनी को तुरंत भांप गया उसने कारण भी पूछ लिया,जब उसे कारण का पता चला तो ठठा कर हंस पड़ा(ठठाकर हँसना कोई सामान्य घटना नहीं है इसके लिये शरीर का नग,नग रोम,रोम सहयोग करता है इतना ही समझलो बस) साहब लोगों काहे इतना समय बरबाद किया हमसे बेसेई पूछ लेते।
तुम्हे पता है!!
बताते हैं पान वाले ने पान लपेटते हुये कहा और अपने काम मे लग गया, जुबान भी चली पर कम बोला क्या बोला?
बोला **कुर्सी से**।।।।बेचारे प्रयोग कर्ता।।।।
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